भगवान श्री परशुराम

महर्षि जमदग्नि पुत्र, श्री परशुराम त्रेता युग में भगवान विष्णु के छठा अवतार के रूप में माँ  रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ था। वे सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की सम्मान व उनके आज्ञा का पालन करते थे। परशुराम जी के महत्वपूर्ण शिष्य भीष्म, द्रोण एवं कर्ण थे।

जन्म– माता सत्यवती के गर्भ से महर्षि जमदग्नि का जन्म हुआ। उनका विवाह प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से हुआ। माता रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे – रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वाननस और परशुराम।

पिता आज्ञानुसार माता का वध– एक बार माता रेणुका हवन हेतु गंगा तट पर जल लेने गई। माता रेणुका स्नान के पश्च्यात हवनहेतू जल लेकर लौट ही रही थी की संयोगवश गन्धर्वराज चित्ररथ को  वहां अप्सराओं के साथ जलविहार करते देखकर आसक्त हो गयी और कुछ देर तक वहीं रुक गयीं। हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्नि ने अपनी पत्नी को अमर्यादित आचरण एवं मानसिक व्यभिचार के दण्डस्वरूप सभी पुत्रों को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी। किंतु मोहवश अन्य पुत्रो ने उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया और श्री परशुराम जी ने बिना सोचे-समझे अपने फरसे से उनका मस्तक कलम कर दिया और ये देखकर मुनि जमदग्रि प्रसन्न हुए और उन्होंने परशुराम से वरदान मांगने को कहा। तब परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने और उन्हें इस बात का ज्ञान न रहे ये वरदान मांगा। इस वरदान के फलस्वरूप उनकी माता पुनर्जीवित हो गईं।

कार्तवीर्यअर्जुन का वध– राजा कार्तवीर्यअर्जुन (भगवान दत्तात्रेय ने युद्ध के समय कार्तवीर्यअर्जुन को हजार हाथों का बल प्राप्त करने का वरदान दिया था, जिसके कारण उन्हें सहस्त्रार्जुन या सहस्रबाहु कहा जाने लगा) युद्ध जीतकर जमदग्रि मुनि के आश्रम में थोड़ा आराम करने के लिए रुक गया। उसने देखा कामधेनु ने बड़ी ही सहजता से पूरी सेना के लिए भोजन की व्यवस्था कर दी है तो वह कामधेनु को अपने साथ बलपूर्वक ले गया। जब यह बात परशुराम को पता चली तो उन्होंने कार्तवीर्य अर्जुन की सहस्त्रभुजाएं काट दी और उसका वध कर दिया। हैहयवंशी महिष्मन्त के वंशज कार्तवीर्य अर्जुन के वध का बदला उसके पुत्रों ने जमदग्रि मुनि का वध करके लिया। क्षत्रियों का ये नीच कर्म देखकर भगवान परशुराम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने कार्तवीर्य अर्जुन के सभी पुत्रों का वध कर दिया। जिन-जिन क्षत्रिय राजाओं ने उनका साथ दिया, परशुराम ने उनका भी वध कर दिया। इस प्रकार भगवान परशुराम ने 21 बार धरती को क्षत्रियविहिन कर दिया।

ब्रह्मवैवर्त पुराण की दन्तकथानुसार कैलाश स्थित भगवान शंकर के निवासस्थान में प्रवेश करते समय गणेश जी द्वारा रोके जाने पर श्री परशुराम जी ने कोपवश फरसे से श्री गणेश जी का एक दाँत कट दिया, जिससे वे एकदन्त कहलाये।

महाभारत कालीन घटनाये

भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा सहायता माँगने के लिये परशुराम जी के पास आयी। तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को समझाया पर ब्रह्मचारी भीष्म के ना मानने पर उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा और उन दोनों के मध्य २३ दिनों तक भयंकर युद्ध चला। किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप श्री परशुराम उन्हें नहीं हरा सके।

जब श्री परशुराम जी अपने जीवन भर की कमाई ब्राह्मणों को दान कर चुके थे तत्पश्यात द्रोणाचार्य उनके पास पहुँचे। तब परशुरामजी ने दयाभाव से द्रोणचार्य को कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिये कहा। तब द्रोणाचार्य जी ने श्री परशुराम जी जी से उनकी समस्त शस्त्र विद्या मांग ली थी।

श्री परशुराम जी ने कर्ण को भी अस्त्र शिक्षा दी थी। लेकिन कर्ण एक सूत का पुत्र था, फिर भी यह जानते हुए कि परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही अपनी विधा दान करते हैं, कर्ण ने छल करके परशुराम से विधा लेने का प्रयास किया। इस छल के कारण ही कर्ण को अपनी अस्त्र विद्या का महाभारत के युद्ध में पूर्ण लाभ नहीं मिल पाया था।

हिंदू धर्म ग्रंथों में अष्टचिरंजीवीयो का वर्णन है इनमें से एक भगवान विष्णु के आवेशावतार परशुराम भी हैं-

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण।
कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन।।
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

इस श्लोक के अनुसार अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, भगवान परशुराम तथा ऋषि मार्कण्डेय अमर हैं।

साभार

  1. https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE
  2. http://www.ajabgjab.com/2015/04/lord-parshurama-some-interestingfacts.html#stha sh.zVuuqRVO.dpuf

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